नरवणे की अप्रकाशित किताब पर राहुल गांधी का बड़ा हमला। FIR, संसद में विवाद और सरकार पर गंभीर सवाल।
नई दिल्ली:
पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब “Four Stars of Destiny” को लेकर देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा है कि यह किताब सत्ता के लिए असहज सच्चाइयाँ सामने ला रही है, इसलिए इस पर चर्चा से बचा जा रहा है।
राहुल गांधी का कहना है कि सरकार संसद में इस मुद्दे पर खुलकर बहस नहीं होने देना चाहती, क्योंकि किताब में ऐसे तथ्य हैं जो सरकार के आधिकारिक दावों पर सवाल खड़े करते हैं, खासकर चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर।
इस रिपोर्ट में क्या है? • नरवणे की किताब पर विवाद कैसे शुरू हुआ • राहुल गांधी का सरकार पर बड़ा हमला • अप्रकाशित किताब और FIR का मामला • बीजेपी–कांग्रेस आमने-सामने • देश के लिए क्यों अहम है यह मुद्दा‘अगर गलत है तो खंडन करो, अगर सही है तो डर क्यों?’
राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि जब एक पूर्व सेना प्रमुख अपनी किताब में अपने अनुभव लिख रहा है, तो सरकार को उससे डरने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
उन्होंने कहा,
“अगर किताब में लिखी बातें झूठ हैं, तो सरकार सामने आकर साफ-साफ कहे।
लेकिन अगर वे सच हैं, तो देश को सच्चाई जानने से क्यों रोका जा रहा है?”
राहुल गांधी का यह भी आरोप है कि संसदीय नियमों का इस्तेमाल सवालों को दबाने के लिए किया जा रहा है, न कि जवाब देने के लिए।
अप्रकाशित किताब और FIR ने बढ़ाया विवाद
विवाद उस समय और गहरा गया जब यह सामने आया कि किताब अभी आधिकारिक रूप से प्रकाशित भी नहीं हुई है, इसके बावजूद उसके कुछ हिस्से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।
इसी मामले में दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज की है, जिसमें बिना अनुमति किताब के प्रसार और साझा किए जाने की जांच की जा रही है।
सरकार का कहना है कि यह प्रक्रिया के खिलाफ है और इससे संस्थाओं की गरिमा पर असर पड़ सकता है।
बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने
बीजेपी का आरोप है कि राहुल गांधी सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं।
वहीं कांग्रेस का पलटवार है कि यह राजनीति का नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक बहस का मुद्दा है।
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देश के लिए क्यों अहम है यह मामला?
यह विवाद सिर्फ एक किताब तक सीमित नहीं है। इसके जरिए कुछ अहम सवाल सामने आ रहे हैं:
- क्या सरकार असहज सच्चाइयों से बच रही है?
- क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सवाल पूछना गलत माना जा रहा है?
- और क्या संसद में खुली चर्चा की गुंजाइश लगातार कम हो रही है?
निष्कर्ष
नरवणे की किताब अब सिर्फ एक संस्मरण नहीं, बल्कि सरकार और विपक्ष के बीच भरोसे की परीक्षा बन चुकी है।
आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि सरकार इन सवालों का जवाब देती है या चुप्पी बनाए रखती है।
“यह आर्टिकल आज तक न्यूज़ चैनल की खबर के अनुसार लिखा गया है।“
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